Friday, 14 June 2019

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 15 June, 2019 at Youtube


   सभापति जी, रुढ़िवादिता का सामना करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए भागीदारी तथा जनसंख्‍या संबंधी शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण कार्यक्रमों को प्रश्रय देने के लिए लोगों की चेतना में परिवर्तन लाने के लिए शिक्षित युवा पीढ़ी का उपयोग।  यह कतिपय उदाहरण ही  हैं लेकिन इनके अंतर्गत आने वाली गतिविधियाँ वास्‍तव में बहुत व्‍यापक हैं।  साधनों के अभाव के कारण नि:संदेह अनेक कठिनाइयाँ हैं।  समूची राष्‍ट्रीय नीतियों के ढाँचे में इन अवरोधों को यथासंभव दूर करना हमारा लक्ष्‍य रहा है।  शिक्षा इस दृष्टि से अभी हमारे लिए सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है। शैक्षिक संस्‍थाओं की आवश्‍यकताओं की ओर हमें ध्‍यान देना होगा क्‍योंकि शिक्षा में निवेश ही देश के विकास से अभिन्‍न रूप से जुड़े मानव संसाधन विकास का आधार है।  
   राष्‍ट्रीय साक्षराता मिशन के अंतर्गत पूरे देश में निरक्षरता उल्‍मूलन के लिए एक विशाल कार्यक्रम शुरू हो चुका है।  जिन जिलों में मिशन अपने कार्यक्रम चला रहा है, वहाँ पर विश्‍वविद्यालय  अपने युवाओं की शक्ति को इस ओर लगा सकते हैं।  युवा क्रियाकलापों को इस क्षेत्र में सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण पहलू जन समूह को आधारभूत साक्षरता की शिक्षा देने वाले ज्ञान केंद्रों में सम्मिलित होने के लिए उत्‍साहित करने हेतु उपयुक्‍त वातावरण का निर्माण होना चाहिए।  वातावरण के निर्माण का मतलब है कि एक ऐसी संस्‍कृति का विकास जिसमें लोगों में लिखना-पढ़ना-सीखने की लालसा उत्‍पन्‍न हो तकि वे साक्षरता प्राप्‍त करने वालों की पहली सीढ़ी में शामिल हों।  वातावरण निर्माण के काम के अतिरिक्‍त ज्ञान देना, विभिन्‍न श्रेणियों के प्रशिक्षकों, मुख्‍य दिशा देने वाले व्‍यक्तियों, कुशल प्रशिक्षकों और स्‍वयंसेवी शिक्षकों की माँग भी बढ़ती जा रही है।  विश्‍वविद्यालय के छात्र समुदाय की इस प्रकार के कामों और अधिक भागीदारी पर कुछ व्‍यय भी नहीं होना और इस प्रकार साक्षरता अभियान को सरकार द्वारा नियुक्‍त किए जाने वालों से कहीं अधिक अच्‍छे शिक्षित व्‍यक्ति उपलब्‍ध होंगे।
   विश्‍वविद्यालय के छात्र इस प्रकार जो स्‍वेच्‍छा से सेवा करेंगे इसकी गुण्‍वत्‍ता उससे कहीं अच्‍छी होगी जो कि वेतन पर काम कर रहे अपेक्षाकृत कम शिक्षित लोगों से मिलेगा।  इन्‍हीं कारणों से यह अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है कि युवा पीढ़ी को और अधिक आभास इस बात का हो कि राष्‍ट्रीय साक्षरता  अभियान में उनकी सेवाओं की कितनी भारी आवश्‍यकता है देश में व्‍यापक रूप से चारों ओर फैली अज्ञानता में विश्‍वविद्यालय ज्ञान-सेतु की भूमिका निबाहते हैं।

Monday, 10 June 2019

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 11 June, 2019 at Youtube


     सभापति जी, भारत के अग्रणी मनीषियों ने राष्ट्र के विकास के लिए युवा शक्ति का उपयोग करने के प्रयास किए हैं और इनमें महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के नाम उल्लेखनीय हैं।  यह मात्र संयोग ही नहीं है कि महात्मा गांधी और कवि टैगोर ने अपने-अपने तरीके से आश्रम की अवधारणा का उपयोग साबरमती और शांति निकेतन में यह दिखाने के लिए किया कि समाज की परंपरा और सभ्यता की परिधि में रह कर भी अभिनव प्रयोग किए जा सकते हैं।  मैं विशेष रूप से कवि के उस शैक्षिक दर्शन और शिक्षा पद्धति में उन प्रयोगों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा जिनके माध्यम से उन्होंने सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व की समस्याओं के निराकरण का प्रयास किया।
आपको याद होगा कि श्रीनिकेतन में कवि और उनके मित्र ने ग्रामीण नवनिर्माण की उस कार्य योजना को आगे बढ़ाया जिसमें एक साथ अनुसंधान, सामाजिक कार्य, कृषि में नए प्रयोग तथा ऐसे लोगों के प्रशिक्षण की भी व्यवस्था थी कि जो श्रीनिकेतन से निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों में गाँवों के विकास को प्रोत्साहन देने जाएँगे। गांधी जी ने साबरमती आश्रम को आधार बनाकर ग्रामीण उद्योगों, विशेषकर खादी कातने और बुनने के पुनरुत्थान के लिए जो कार्य योजना बनाई थी वह भी बहुत कुछ इस योजना से मिलती-जुलती ही थी। यद्यपि इन दोनों महान चिंतकों में पारंपरिक उद्योगों का आधुनिकीकरण जैसे, कुछ विषयों पर मतभेद थे, लेकिन उनका लक्ष्य एक था एवं दोनों ने ही अपने विचारों को मूर्त रूप देने के लिए आश्रम को आधार बनाया।
   मानव संसाधन विकास में युवा पीढ़ी की भूमिका पर समसामयिक अर्थव्यवस्था और समाज की नई माँगों के परिप्रेक्ष्य में विचार करने की आवश्यकता है।  संभवतया युवा पीढ़ी की भूमिका पर तथा युवा पीढ़ी को संसार से परिचित कराने वाले शैक्षिक संस्थानों की भूमिका पर पुनर्विचार करते समय हमें रवींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन में किए गए शैक्षिक प्रयासों के मूल में उनके दर्शन के अध्ययन से बहुत लाभ हो सकता है।  हमें अपने नए चिंतन और कर्म का आधार टैगोर जैसे महान नेताओं के कार्यों और परंपराओं को बनाना होगा।  कौन-से ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें शिक्षित युवा पीढ़ी मानव संसाधन विकास और मोटे तौर पर समाज के निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका निभा सकती है।  शायद ऐसी गतिविधियों के लिए तीन सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र हैः निरक्षरता उन्मूलन, गैर-सरकारी संगठन और स्वयंसेवी संगठन।

Friday, 22 March 2019

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 7 June, 2019 at Youtube


       अध्‍यक्ष महोदय, ग्राम पंचायत स्‍तर पर भू-राजस्‍व ही आय का एक मात्र स्‍थायी साधन है और अगर यह पंचायतों को मिलता है तो उन्‍हें अपना काम प्रारंभ करने के लिए प्रारंभिक अवस्‍था में ही कुछ धनराशि मिल जाएगी।  किसी भी राज्‍य के कानून में इसकी व्‍यवस्‍था नहीं है।  लेकिन मध्‍य प्रदेश अधिनियम के अंतर्गत जारी किए गए आदेशों में इसकी व्‍यवस्‍था की गई है।  इससे पंचायतों के काम-काज में गति आएगी।  यह एक सकारात्‍मक बात है।  बाजार से प्राप्‍त शुल्‍क पंचायतों को मिलता है और अब भू-राजस्‍व भी उन्‍हें मिलेगा।  मुख्‍यमंत्री ने बताया कि जनपदों के पास कोई राजस्‍व नहीं है।  मेरा विचार है कि भू-राजस्‍व को आपस में बाँट लेना चाहिए।  कुछ राजस्‍व का 60 प्रतिशत ग्राम पंचायत के पास रह सकता है, 20 प्रतिशत जनपद के पास और शेष प्रतिशत जिला पंचायत के पास दिया जा सकता है ।
   हमें याद है कि 1989 में एक सर्वेक्षण किया गया था और यह देखा गया था कि राज्‍य में पंचायतों की औसत प्रति व्‍यक्ति आय 60 पैसे थी।  मेरे विचार से उस समय से आज तक स्थितियों में कोई बहुत ज्‍यादा परिवर्तन नहीं आया है।  60 पैसे की प्रति व्‍यक्ति आय से किसी पंचायत को नहीं चलाया जा सकता।  इसलिए धन का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा करों, अनुदानों और करों की जिम्‍मेदारी के जरिये बाहर से लाना ही होगा।  मुझे आशा है कि राज्‍य वित्‍त आयोग इन पहलुओं पर ध्‍यान देगा और इसकी सिफारिशों को स्‍वीकार करने से मामले में सरकार पर्याप्‍त रूप से अनुकूल रुख अपनाएगी।
   वित्‍तीय संसाधनों पर ध्‍यान दिया गया है और वर्तमान में जो भी व्‍यावहिारक है, किया गया है।  फिर भी भूमि-कर को लेकर मेरे अंदर कुछ शंकाएँ हैं।  भूमि राजस्‍व और उपकर पहले से ही मौजूद हैं।  इनके अतिरिक्‍त जमीन पर लगने वाले कुछ अन्‍य करों का भी प्रावधान तैयार किया गया है।  राज्‍य सरकार द्वारा दो तरह के कर लागू किए जा सकते हैं – उदाहरणार्थ प्रत्‍येक रुपये पर 50 पैसे का उपकर और एक प्रतिशत अतिरिक्‍त स्‍टांप शुल्‍क।  अधिनियम में करों के लिए दो अनूसूचियाँ दी गई हैं।  इनमें से एक बाध्‍यकारी है और इसके अंतर्गत 6 मदे हैं।  दूसरी वैकल्पिक है और इसमें 14 मदे हैं।  इसके अतिरिक्‍त जमीन पर भी कर लगेंगे।  यह देखना आवश्‍यक ही नहीं अनिवार्य होगा कि कर के बोझ को संबद्ध भूमि झेल सकती है या नहीं।  

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 22 March, 2019 at Youtube


यह खबर एक ही साथ डराने वाली भी है और परेशान करने वाली भी कि वेस्ट नाइल वायरस के संक्रमण से केरल में एक बच्चे की मौत हो गई। केरल में पिछले दिनों इस संक्रमण के कुछ मामले दर्ज हुए, मगर इसकी वजह से किसी की मौत की यह पहली खबर है। यहां इस बात पर ध्यान दिया जाना जरूरी है कि सिर्फ दस प्रतिशत मामलों में ही वेस्ट नाइल वायरस का संक्रमण किसी मरीज की मौत का कारण बनता है। अभी हम यह ठीक से नहीं जानते हैं कि केरल का यह मामला उन्हीं दस प्रतिशत में से एक था या फिर उस बच्चे की मौत का कारण ठीक से और समय रहते इलाज न हो पाना था। यहां हमें डेंगू के उदाहरण पर ध्यान देना चाहिए। आमतौर पर डेंगू को ऐसा रोग नहीं माना जाता कि इसकी वजह से किसी की जान चली जाए। लेकिन भारत में यह ऐसे रोगों में ही गिना जाने लगा है। डेंगू से संक्रमित व्यक्ति के रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या काफी तेजी से कम होने लगती है। अगर संक्रमण को समय पर पहचान लिया जाए और रक्त में प्लेटलेट्स की कमी पूरी कर दी जाए, तो रोगी को बचाया जा सकता है। लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं के हर जगह पर सुलभ न हो पाने के कारण हमारे देश में यह रोग अक्सर जानलेवा साबित होता है। संभव है कि यह कारण न भी हो, लेकिन हमें स्वास्थ्य सुविधाओं को सुलभ कराने के लिए सक्रिय तो होना ही होगा।
यहां डेंगू का जिक्र इसलिए भी जरूरी है कि वेस्ट नाइल वायरस डेंगू परिवार का ही वायरस है और उसी तरह मच्छरों से फैलता है। लेकिन वेस्ट नाइल वायरस का सबसे नजदीकी रिश्ता इंसेफ्लाइटिस से है, यानी उस रोग से, जिसकी वजह से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों में हर साल कई बच्चों की जान चली जाती है। वेस्ट नाइल वायरस का फैलना इसलिए भी चिंता का कारण होना चाहिए। लेकिन यह खबर एक और कारण से परेशान करने वाली है। वेस्ट नाइल वायरस का संक्रमण एक पुराना रोग है, दुनिया के कई हिस्सों में यह पिछली एक सदी से भी ज्यादा समय से फैलता रहा है। लेकिन भारत इससे बचा रहा है। साल 1952 में हुए एक शोध में पाया गया था कि भारतीयों के शरीर में इस वायरस से लड़ने वाली एंटीबॉडीज पहले से ही मौजूद हैं, इसलिए यह वायरस उनके शरीर को नुकसान नहीं पहुंचा पाता। लेकिन अब अगर यह वायरस नुकसान पहुंचा रहा है, तो इसके कारण पर शीघ्र ही शोध की जरूरत होगी। कारण कुछ भी हो सकता है। यह भी हो सकता है कि इस वायरस ने अपने रूप में ऐसा परिवर्तन या म्युटेशन कर लिया है कि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली बेमतलब हो गई है, या फिर जिन लोगों को यह संक्रमण हुआ, उनमें यह प्रतिरक्षा तंत्र मौजूद नहीं था।
इस मौके पर कुछ और चीजें हैं, जिन पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। मच्छरों से होने वाले संक्रमण पिछले कुछ समय में हमारे देश में बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं। यहां तक कि उस मलेरिया के मामले भी, जिसका एक समय में हमने उन्मूलन का दावा कर दिया था। मलेरिया उन्मूलन से अब तक के अनुभवों ने यह सिखा दिया है कि मच्छरों के खिलाफ लड़ाई कीटनाशकों के भरोसे नहीं जीती जा सकती। अच्छा तरीका वही पुराना है कि जगह-जगह पानी के जमाव को रोका जाए, ताकि मच्छरों को पनपने का मौका ही न मिले। मच्छरों से मुक्ति को स्वच्छ भारत मिशन जैसे कार्यक्रम में शामिल करने की जरूरत है।


Saturday, 10 November 2018

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 10 Nov., 2018 at Youtube


अफगानिस्तान में तालिबान के तख्ता पलट को 17 साल होने वाले हैं, लेकिन वहां की समस्या अभी तक सुलझी नहीं है। ओसामा बिन लादेन की मौत और जैसे-तैसे लोकतंत्र की बहाली के बावजूद अफगानिस्तान में शांति कायम होना अभी भी दूर की कौड़ी लगता है। यह भी सच है कि बीते कुछ समय में इस्लामिक स्टेट के तेजी से उभार के चलते अफगान समस्या से लोगों का ध्यान हट सा गया था, लेकिन अब जब वह उभार कुछ ठंडा पड़ा है, तो अफगानिस्तान एक बार फिर प्राथमिकता सूची में आ गया है। यह ठीक है कि पिछले तकरीबन डेढ़ दशक में शांति की सारी कोशिशें नाकाम रही हैं, इसलिए मास्को में जो ताजा वार्ता शुरू हो रही है, उससे बहुत ज्यादा उम्मीद बांधने का कोई कारण नहीं है। लेकिन कोशिश का होना यह तो बताता है कि दुनिया के देशों ने अभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है। इस वार्ता की खास बात यह है कि इसमें 12 देशों के प्रतिनिधियों के अलावा तालिबान के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। यानी वह पक्ष भी शामिल होगा, जिसे वर्तमान समस्या और उसके गहराते जाने का कारण माना जाता है। लोकतांत्रिक सोच यही कहती है कि शांति वार्ताओं में सभी पक्षों को एक साथ बैठना चाहिए, भले ही उसमें से कोई एक अतिवादी क्यों न हो। 
लेकिन इस वार्ता ने भारत की विदेश नीति के लिए एक धर्मसंकट भी खड़ा किया है। भारत का स्टैंड अभी तक यह रहा है कि वह ऐसी किसी वार्ता में शामिल नहीं होगा, जिसमें तालिबान भी मौजूद हों। भारत ने इस नीति को बदला नहीं है, लेकिन नई दिल्ली ने मास्को सम्मेलन में भाग लेने के लिए अपने दो प्रतिनिधि जरूर भेज दिए हैं। भारत के दो अनुभवी पूर्व राजनयिक अमर सिन्हा और टीसीए राघवन इस सम्मेलन में भाग लेंगे। यह ऐसा फैसला है, जिसकी कुछ लोग आलोचना भी कर रहे हैं, लेकिन इस मामले में विदेश मंत्रालय ने जो रणनीति अपनाई है, उसे भी समझा जाना जरूरी है। भारत अगर इस सम्मेलन का बहिष्कार कर देता, तो यह माना जाता कि अफगान समस्या के समाधान में वह कोई भूमिका नहीं निभा रहा है। भारत उन देशों में है, जहां अफगान समस्या का सीधा असर पड़ा था, और बाद के दौर में अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण कार्यों में भी उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में, यह जरूरी है कि अफगानिस्तान में शांति के किसी भी अंतर्राष्‍ट्रीय प्रयास में भारत के पक्ष को जोरदार तरीके से रखा जाए। सम्मेलन में भारत की भागीदारी को इसी से जोड़कर देखा जाना चाहिए। भारत कभी ऐसा देश नहीं रहा, जो अतिवादी संगठनों से परहेज की जिद पर हर सूरत में अड़ा रहा हो। अतीत में भी हमने हथियार छोड़कर वार्ता की मेज पर आने वाले कई संगठनों से बातचीत की है। ऐसी ही एक वार्ता इन दिनों नगा विद्रोहियों से चल रही है।
इस समय जब पूरी दुनिया अफगान समस्या को नए ढंग से देख रही है, तो यह बात भी स्पष्ट हो रही है कि पूरे मामले में तालिबान से बड़ी खलनायकी पाकिस्तान की थी। हालांकि अमेरिका जैसे देशों की दिक्कत यह रही है कि उनकी अफगान नीति में पाकिस्तान हमेशा ही केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है, इसलिए वे पाकिस्तान के सारे पाप माफ करते रहे हैं। यह वार्ता रूस में हो रही है, इसलिए यह पाकिस्तान की भूमिका के सवाल को उठाने का शायद सबसे अच्छा मौका भी है। भारतीय नजरिये का वार्ता में प्रतिनिधित्व इस लिहाज से भी जरूरी है।

Thursday, 8 November 2018

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 09 Nov., 2018 at Youtube


तीन दिन बाद दंतेवाड़ा में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है, दीपावली के ठीक अगले दिन माओवादियों की बारूदी सुरंग ने जिस तरह चुनाव ड्यूटी पर लगे एक वाहन को उड़ाया, वह बताता है कि वहां कर्मचारी किस तरह जान जोखिम में डालकर चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराने में लगे हैं। इस हमले में वाहन के परखचे उड़ गए और सुरक्षा बलों के जवानों समेत उसमें बैठे कई लोगों को जान गंवानी पड़ी। अभी कुछ ही दिनों पहले इसी क्षेत्र में चुनाव की रिपोर्टिंग करने गए मीडियाकर्मियों पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला बोला था और इस हमले में एक पत्रकार की जान भी चली गई थी। ऐसा नहीं है कि खतरा सिर्फ चुनाव कार्य में लगे लोगों, सुरक्षा बलों या फिर चुनाव कवरेज के लिए गए लोगों पर ही मंडरा रहा है। खतरा चुनाव लड़ रहे या चुनाव प्रचार में लगे राजनीतिक दलों के लोगों पर भी है और सबसे बड़ी बात है कि खतरा उन आम लोगों पर भी है, जो तीन दिन बाद मतदान के लिए पोलिंग बूथों पर जाएंगे। माओवादियों ने पूरे क्षेत्र में चुनाव के बहिष्कार की अपील की है। इसके लिए उन्होंने परचे भी बांटे और पोस्टर भी लगाए हैं। माओवादियों की दिक्कत यह है कि ऐसा वे हर चुनाव में करते हैं और इसके बावजूद लोग वहां भारी संख्या में मतदान के लिए जाते हैं। ऐसे में, उनके सामने एक ही चारा बचता है कि वे आतंक पैदा करें, ताकि लोग मतदान के लिए घरों से निकलने में डरें। विस्फोट और हिंसा की ताजा घटनाएं माओवादियों की इसी हताशा का नतीजा है।
समस्या किस तरह की है, इसे चुनाव आयोग भी अच्छी तरह समझ रहा है और सरकारें भी। इसीलिए छत्तीसगढ़ में पहले दौर के मतदान के लिए सुरक्षा बलों के 65 हजार अतिरिक्त जवानों की तैनाती की गई है। माओवाद विरोधी अभियान के लिए इस क्षेत्र में केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवान पहले से ही मौजूद हैं। पहले दौर के लिए जिन 18 सीटों पर 12 नवंबर को मतदान होना है, वे सब माओवाद प्रभावित क्षेत्र में ही हैं। इस पूरे क्षेत्र में सुरक्षा बलों की उपस्थिति काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुरक्षा बलों की मौजूदगी से आश्वस्त होकर ही लोग घरों से निकलते हैं और मतदान के लिए जाते हैं। इसके अलावा, इन बलों के जवान राजनीतिज्ञों और कार्यकर्ताओं को भी सुरक्षा देते हैं और मीडियाकर्मियों को भी। इसीलिए आतंकवादी इस क्षेत्र में सुरक्षा बलों को ही सबसे पहले निशाना बनाते हैं।
यह लगभग तय है कि माओवादी इस बार भी मुंह की खाएंगे। हर बार की तरह इस बार भी लोग बड़ी संख्या में वोट देने निकलेंगे और अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट देंगे। एक बार फिर जनमत उन बंदूकों को मात देगा, जो उन लोगों के ही खिलाफ खड़ी हैं, जिनकी लड़ाई लड़ने की बात नक्सली करते हैं। लोकतंत्र के साथ जंग में उनकी बंदूकें, उनकी बारूदी सुरंगें भले ही कुछ लोगों की जान ले रही हों, लेकिन वे लगातार हार रही हैं। देश के दूर-दराज के इलाकों में बच गया माओवाद अब कोई विचारधारा नहीं, एक जिद भर है। लोगों की जान लेने वाली जिद को ही आतंकवाद कहा जाता है। एक जिद का मुकाबला एक कड़े संकल्प से ही हो सकता है। इस आतंकवादी जिद को जड़ से उखाड़ने का संकल्प लेने का समय आ गया है। इसके दो ही रास्ते हैं, एक तो लगातार कड़ी कार्रवाई और दूसरे, लगातार ऐसा विकास, जिसका लाभ सभी तक पहुंचे। माओवादी इसीलिए विकास का भी विरोध करते हैं। 

Sunday, 21 October 2018

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 21 Oct, 2018 at Youtube


महोदय, हमारी संघीय रचना और जनता द्वारा चलाए जाने वाले स्‍थानीय शासनतंत्र से और सत्‍ता के विकेंद्रीत प्रयोग से हमारी एकता सुदृढ़ हुई है।  कभी-कभी तनाव और असहमति होती है, किन्‍तु हमारे विकास की वर्तमान अवस्‍था में और विशेष रूप से इस कारण ऐसा होना अनिवार्य है कि हमारे पास इतने कम साधन हैं कि प्रत्‍येक को संतुष्‍ट नहीं किया जा सकता।  हमारे से छोटे देशों में भी अब क्षेत्रीय खींचातानी अनुभव की जा रही है।  इन स्थितियों में हमने अपने राष्‍ट्रीय पुनर्निर्माण का कार्य अपने हाथ में लिया।  अपनी पंचवर्षीय योजनाओं में, सामाजिक सुविधाएँ बढ़ाने, उद्योगों के लिए आवश्‍यक ढाँचा खड़ा करने और ऐसे बुनियादी उद्योग स्‍थापित करने का काम शासन ने  अपने जिम्‍मे लिया है, जिन्‍हें निजी उद्योग स्‍थापित नहीं कर सकते।  साथ ही निजी उद्योगों के लिए भी बड़ा क्षेत्र बचा है और स्‍वतंत्रता के बाद निजी उद्योगों के लिए बढ़ने की बहुत गुंजाइश है और वास्‍तव में इन्‍होंने इतनी अधिक उन्‍नति की है कि इन्‍हें पहचानना कठिन है।
   विकास से अंततोगत्‍वा सब वर्गों को सहायता मिलती है।  फिर भी, यह लगता है कि शुरू के चरणों में इसके कारण असमानताएँ बढ़ती हैं।  हमें इस तरह के असंतुलन ठीक करने के बारे में सदा सजग रहना चाहिए।  साथ ही आर्थिक कारणों के साथ-साथ सामाजिक कारणों पर भी ध्‍यान देना चाहिए।  इस स्थिति के कारण कई बार हमारी गति मंद पड़ जाती हैं।  किंतु युद्ध, प्राकृतिक आपत्तियों और अन्‍य कठिनाइयों के होते हुए भी हम आगे बढ़े हैं।  हमने अपने लोकतंत्र को सुदृढ़ किया है। हमारे साढ़े सात करोड़ बच्‍चे स्‍कूलों में पढ़ रहे हैं और लगभग बीस लाख विद्यार्थी कालेजों मे हैं।  हमारे देश में 50 करोड़ परिवार खेती करते हैं।  खेती ही हमारे लिए सबसे महत्‍वपूर्ण हैं।  पिछले 55 वर्षों में खेती के विकास के लिए आवश्‍यक ढाँचा स्‍थापित किया जा चुका है और 23 करोड़ एकड़ नई जमीन में सिंचाई होने लगी है।  हमारे किसान नए ढंग से खेती करने लगे हैं और उन्‍हें खेती के लिए आवश्‍यक चीजें दी जाने लगी हैं।  उनकी समस्‍याएँ हल करने के लिए वैज्ञानिकों की सहायता ली गई है और आज हम अन्‍न की दृष्टि से और सुदृढ़ हो गए हैं।  कृषि के सुधार के लिए, लोगों को रोजगार देने और स्‍वावलंबी बनाने के लिए हमें उद्योगों की आवश्‍यकता है।  उद्योगों का हमने तीन गुना विकास किया है और कर रहे हैं।

Monday, 15 October 2018

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 15 Oct, 2018 at Youtube


          महोदय, जापान की यात्रा सदा ही सुखद होती है।  यहाँ इतना कुछ और इतनी तेजी से हो रहा है कि यहाँ बार-बार आकर यहाँ के लोगों और देश से बार-बार परिचय करने का महत्‍व है।  जापान की प्रगति की भारतवासी बहुत सराहना करते हैं।  युद्ध के बाद आपका अपने देश का पुनर्निर्माण और आपकी हाल की आर्थिक सफलताएँ असाधारण हैं, किंतु आपने जिस ढंग से अपनी राजनीतिक और सामाजिक प्रणाली का कायापलट किया है और लोकतंत्र की स्‍थापना की है वह भी कम महत्‍वपूर्ण नहीं।  मैं वर्तमान जापान की आत्‍मशक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करता हूँ।  हम भारतवासी आपकी सफलताओं को बड़ी दिलचस्‍पी से देखते हैं और इस प्रयत्‍न में रहते हैं कि आपके कौन-से अनुभव से हमें अपने प्रयत्‍नों में सफलता मिल सकती है।  कोई चीज भी दूसरे से पूरी की पूरी उधार नहीं ली जा सकती।  उसको लेकर आत्‍मसात करना होता है।  विज्ञान के सिद्धांत तो सार्वभौम हैं, लेकिन प्रौद्योगिकी लोगों के सामाजिक वातावरण के अनुकूल ढाली जानी चाहिए।
    जो लोग भारत के बाहर हैं, उनके लिए हमारे देश को समझना और हमारे प्रयत्‍नों की विशालता का अनुमान लगाना कठिन है। हमने आपसे बहुत बाद में शुरुआत की।  जब हम स्‍वतंत्र हुए तो हमारे देश के पाँच सौ से ऊपर राजनीतिक टुकड़े थे।  जनसंख्‍या बहुत अधिक थी।  भाषाओं और धर्मों की बहुतायत थी।  विभिन्‍न राज्यों में ही नहीं, एक ही राज्‍य के भिन्‍न-भिन्‍न भागों में विकास का स्‍तर भिन्‍न-भिन्‍न था।  इन सब बातों के कारण हमारी कठिनाइयाँ बहुत बढ़ गईं।  ऐसा विशेष रूप से इस कारण था कि हमने लोकतंत्रीय मार्ग अपनाया।
    पिछले आम चुनावों के बाद बहुत-से राजनीतिक दल उठ खड़े हुए हैं और एक राज्‍य में गैरकांग्रेसी दल का शासन है और पाँच राज्‍यों में कई दलों की संयुक्‍त सरकारें हैं।  हमने इन सब बातों को अपने राजनीतिक विकास का ही एक चरण माना है।  कुछ उग्रवादी दल हैं।  फिर भी अपने उद्देश्‍य और तौर तरीकों में वे चाहे जितने भिन्‍न हों, हमें उनके मत को इस तरह ढालना है कि वे भी देश की एकता और प्रगति में पूरी तरह भागीदारी कर सकें।  हमने अपने प्रयत्‍नों से पूरी ईमानदारी से भावनात्‍मक एकता और भागीदारी तो पैदा की है, लेकिन उसी से सशक्‍त स्‍थानीय परंपराएँ भी जन्‍मी हैं।  एकता का अर्थ एक-सा होना नहीं होता।   

Saturday, 13 October 2018

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 13 Oct, 2018 at Youtube


     उपसभापति जी, हमारे विशेषज्ञों ने कहा है कि जिन देशों में पहले शिक्षा का विकास हुआ है वहाँ शेष विकास बड़ी सरलता से हुआ है और जिन देशों में शिक्षा का विकास नहीं हुआ, केवल पैसा मिलता रहा उनको, तो उसके कुछ और ही परिणाम हो सकते हैं। एक-एक देश का नाम लेकर बता सकता हूँ लेकिन देशों का नाम लेना ठीक नहीं है हमारे देश में पैसा बाद में आया।  जो बौद्धिक विकास है,  आर्थिक विकास है उसको पहली प्राथमिकता दी गई यह हमारे पुराने इतिहास से स्‍पष्‍ट है, और लोग भी इसको मानने लगे हैं कि जो प्राथमिकता भारत में ली गई है।  हमारे इतिहास के द्वारा वह सही है तो जब आप विकास की बात मानते हैं तो आपको अपनी प्राइमरी स्‍कूल की बात तो सोचनी ही चाहिए।  प्राइमरी स्‍कूल को कितने सरपंच देखते हैं।
    गाँवों को लोग देखते हैं उसके बारे में कोई भी आँकड़े रखते हैं मुझे याद है जब हम गाँवों में भाषण देने जाते थे तो प्राइमरी स्‍कूल से मेजें और कुर्सियाँ हमारी बैठक में उठा कर लाई जाती थीं और स्‍कूल के बच्‍चों की छुट्टी हो जाती थी।  तो यह कोई तरीका नहीं है और जब वहाँ आपको पौष्टिक आहार देना है तो मैं तो नहीं करूँगा यह, वह तो सरपंच साहब या जो महिला सदस्‍या हैं उनको अपने ऊपर लेना पड़ेगा और यह बड़ी खुशी की बात है कि हमने महिलाओं का भरपूर सहयोग इन संगठनों में रखा है।  वह चुन कर आई हैं, और कहीं–कहीं तो पुरुषों के बदले वे ही चुन कर आई हैं।
    कर्नाटक में या किसी दूसरे राज्‍य में कहा गया था कि 33 प्रतिशत की बजाय 46 प्रतिशत महिलाएँ चुन कर आई हैं।  मैं उनका स्‍वागत करता हूँ।  इसके साथ-साथ यह जो आपके सामने चुनौती है इस कार्यक्रम की जिसको शायद आपने पहले कभी नहीं लिया है इस चुनौती का सामना करने के लिए आपको संगठित शक्ति चाहिए।  अपसी झगड़ों  से परे हट कर आपको देखना है कि जो गाँव में गरीबी है उसे कैसे दूर करना है। कई समाजशास्त्रियों ने यह कहा है कि आज एक बहुत बड़ा अवसर मिल गया है कि पंचायतों को गरीबी को हटाने का उपाय आप सोच सकते हैं बाहर कोई नहीं सोच सकता।  तो यह तीसरा काम करना है।  एक तो वोटिंग का, दूसरा विकास वाला और तीसरा जो बुनियादी काम है गरीबी हटाने का, शीघ्र करना है ।
     उपसभापति जी, यह आपकी परीक्षा भी होगी और आपकी सफलता भी होगी।  पैसा वहाँ पहुँचाने की सीमा तक हमारी सफलता है, हमारा काम है। लेकिन जब सही आदमी को सही सहायता मिलती है, तो वह सफलता आपकी रहेगी और आप ही के माध्‍यम से काम होगा।  मुझे यह कहते हुए बड़ी खुशी हो रही है, मैं आशान्वित हूँ, जो आज तक नहीं हुआ, अब होने को है।  हम बहुत सोच रहे हैं कि ये पैसा कहाँ भेजें।  हम शासन में हैं और राजनीति में हैं और पार्टी राजनीति है।  तो यह रुझान भी हमको देखने को मिला है कि यहाँ भेजा हुआ पैसा, किसी और में अपने नाम से वहाँ खर्च किया।  अपनी पार्टी के नाम से या अपनी पार्टी के बनाए हुए किसी लेबिल के नीचे उस पैसे को खर्च किया।   मैं आपको बताना चाहता हूँ कि इसकी कोई आवश्‍यकता नहीं है
    मुझे नहीं मालूम, यहाँ जो सरपंच बैठे हुए हैं उनमें से किस पार्टी का कौन है, कितने हैं, मुझे इसकी परवाह भी नहीं है।  यह मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि हमारा राज तीन स्‍तरों पर चल रहा है एक केंद्रीय स्‍तर, एक राज्य स्‍तर और तीसरा जिसको आप स्‍थानीय कहते हैं जिसके आप प्रतिनिधि हैं।  इन तीनों स्‍तरों पर राजनीति चल रही है।  इसमें पार्टी की कोई आवश्‍यकता नहीं है, पार्टीबाजी की कोई आवश्‍यकता नहीं है और पार्टी के नाम पर कोई झगड़ा करने की आवश्यकता नहीं है।  
    जब केंद्रीय सरकार से पैसा आता है तो यह मानकर चलना चाहिए कि केंद्रीय सरकार से पैसा आता है, केंद्रीय सरकार उन्‍हीं की बनाई हुई, जिन्‍होंने राज्‍य सरकार बनाई है।  केंद्रीय सरकार में हमेशा एक ही पार्टी रहेगी, इसका क्‍या है कोई भी पार्टी आ सकती है केंद्र में लेकिन केंद्र सरकार, केंद्रीय सरकार ही रहेगी।  तो इसको छिपाना और इस पर पर्दा डालना और इसको कुछ उलटा–पुलटा समझाने का कोई लाभ नहीं है।  लोग अपने आप समझ जाएँगे कि पैसा केंद्रीय सरकार का है केंद्रीय सरकार का मतलब है, यह भी लोगों का ही है।  लेकिन हमारे संविधान में तीन स्‍तर बने हुए हैं केंद्र, राज्‍य और स्‍थानीय।  इन तीनों में विभाजन जैसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए और समझ लेना चाहिए।  राज्‍य सराकर हमारे कार्यक्रमों को बदल डाले, कोई दूसरा नाम दे और ये पैसा दूसरे नाम से खर्च करने लगे ठीक नहीं है।  

Wednesday, 10 October 2018

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 11 Oct, 2018 at Youtube


          सभापति महोदय, विकास की यह दीर्घकालीन चुनौती है कि हम अधिक से अधिक प्रयत्‍न करें और जिस प्रकार धनी और पिछड़े देशों को आपस में सहायोग करना आवश्यक है उसी तरह विकासशील देशों को भी एक दूसरे से व्‍यापार और दूसरे तरीकों से सहायता देकर सहयोग करना चाहिए।  हमारे लिए अपने साधन और कौशल को आपसी लाभ के लिए बाँटना संभव होना चाहिए।  इस प्रकार के द्विपक्षीय सहयोग का परिणाम यह होगा कि क्षेत्रीय आर्थिक सहयेाग के लिए बहुत से देशों में आपस में समझौते होंगे।
    सामाजिक लक्ष्‍य सिद्ध करने के लिए आं‍तरिक एकता और बाहरी खतरे से मुक्ति भी बेहद आवश्‍यक है।  संसार के सात बड़े देशों में से पाँच एशिया में हैं और उनमें इंडोनेशिया और भारत की भी गिनती होती है।  हम आशा करते हैं कि हमारा सारा क्षेत्र शांति और सहयोग का क्षेत्र होगा जिस पर किसी बाहरी शक्ति का न तो दबाव होगा और जहाँ न किसी प्रकार का तनाव और आपसी विरोध होगा।  तनाव तब हेाता है जब कोई देश दूसरे देश के मामलों में हस्‍तक्षेत्र करे।  यही कारण हे कि हम हमेशा इस तरह के हस्‍तक्षेप के विरूद्ध रहे हैं और हमारा सदा यह विश्‍वास रहा है कि सब देश शांति और सहअस्तित्‍व की भावना से रहें।    
    जिन सिद्धान्‍तों पर हमारी विदेश नीति आधारित है, उनमें से एक सिद्धान्‍त गुट-निरपेक्षता है।  हम सैनिक गठबंधन से बाहर रहे हैं, क्‍योंकि हम समझते हैं कि इस तरह के गठबंधनों से थोड़ी देर के लिए सुरक्षा का धोखा हो जाता है।  वास्‍तवि‍क शक्ति कभी नहीं प्राप्‍त होती।  आजकल शक्ति शून्‍यता या रिक्‍तता की बहुत चर्चा है और किसी क्षेत्र से विभिन्‍न राष्‍ट्रों की सेनाएँ हट जाने से जो रिक्‍तता हो सकती है उसके बारे में मुझसे प्रश्‍न पूछे गए हैं।  मैं यह भविष्‍यवाणी नहीं कर सकती कि क्‍या होगा लेकिन यह कहा जा सकता है कि जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा और हालैंड ने इंडो‍नेशिया छोड़ा तो उससे दोनों देशों में शक्ति शून्‍यता आ गई।  लेकिन हमारे राष्‍ट्रों ने इसे तत्‍काल भर दिया।  मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि इस क्षेत्र के देश इस रिक्‍तता को स्‍वयं भर सकते हैं।  एशिया में दो युद्ध हो चुके हैं।  वियतनाम में एक आशा की किरण फूटी है कोई भी समझौता हो, यह निश्‍चय है कि इससे नई चुनौतियाँ, नई समस्‍याएँ सामने आएँगी।  हम सब को इस तरह की समस्‍याओं को हल करने में सहायता करनी चाहिए।

Sunday, 7 October 2018

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 8 Oct, 2018 at Youtube




          सभापति महोदय, विकास की यह दीर्घकालीन चुनौती है कि हम अधिक से अधिक प्रयत्‍न करें और जिस प्रकार धनी और पिछड़े देशों को आपस में सहायोग करना आवश्यक है उसी तरह विकासशील देशों को भी एक दूसरे से व्‍यापार और दूसरे तरीकों से सहायता देकर सहयोग करना चाहिए।  हमारे लिए अपने साधन और कौशल को आपसी लाभ के लिए बाँटना संभव होना चाहिए।  इस प्रकार के द्विपक्षीय सहयोग का परिणाम यह होगा कि क्षेत्रीय आर्थिक सहयेाग के लिए बहुत से देशों में आपस में समझौते होंगे।
    सामाजिक लक्ष्‍य सिद्ध करने के लिए आं‍तरिक एकता और बाहरी खतरे से मुक्ति भी बेहद आवश्‍यक है।  संसार के सात बड़े देशों में से पाँच एशिया में हैं और उनमें इंडोनेशिया और भारत की भी गिनती होती है।  हम आशा करते हैं कि हमारा सारा क्षेत्र शांति और सहयोग का क्षेत्र होगा जिस पर किसी बाहरी शक्ति का न तो दबाव होगा और जहाँ न किसी प्रकार का तनाव और आपसी विरोध होगा।  तनाव तब हेाता है जब कोई देश दूसरे देश के मामलों में हस्‍तक्षेत्र करे।  यही कारण हे कि हम हमेशा इस तरह के हस्‍तक्षेप के विरूद्ध रहे हैं और हमारा सदा यह विश्‍वास रहा है कि सब देश शांति और सहअस्तित्‍व की भावना से रहें।    
    जिन सिद्धान्‍तों पर हमारी विदेश नीति आधारित है, उनमें से एक सिद्धान्‍त गुट-निरपेक्षता है।  हम सैनिक गठबंधन से बाहर रहे हैं, क्‍योंकि हम समझते हैं कि इस तरह के गठबंधनों से थोड़ी देर के लिए सुरक्षा का धोखा हो जाता है।  वास्‍तवि‍क शक्ति कभी नहीं प्राप्‍त होती।  आजकल शक्ति शून्‍यता या रिक्‍तता की बहुत चर्चा है और किसी क्षेत्र से विभिन्‍न राष्‍ट्रों की सेनाएँ हट जाने से जो रिक्‍तता हो सकती है उसके बारे में मुझसे प्रश्‍न पूछे गए हैं।  मैं यह भविष्‍यवाणी नहीं कर सकती कि क्‍या होगा लेकिन यह कहा जा सकता है कि जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा और हालैंड ने इंडो‍नेशिया छोड़ा तो उससे दोनों देशों में शक्ति शून्‍यता आ गई।  लेकिन हमारे राष्‍ट्रों ने इसे तत्‍काल भर दिया।  मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि इस क्षेत्र के देश इस रिक्‍तता को स्‍वयं भर सकते हैं।  एशिया में दो युद्ध हो चुके हैं।  वियतनाम में एक आशा की किरण फूटी है कोई भी समझौता हो, यह निश्‍चय है कि इससे नई चुनौतियाँ, नई समस्‍याएँ सामने आएँगी।  हम सब को इस तरह की समस्‍याओं को हल करने में सहायता करनी चाहिए।

Friday, 5 October 2018

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 6 Oct, 2018 at Youtube


    सभापति महोदय, मैं आपको बता सकता हूँ अपने अनुभव से कि भारत जब स्‍वतंत्र हुआ तो यहाँ बहुत दंगे हुए।  लोगों को बड़ी परेशानी हुई और उनको इधर से उधर जाना पड़ा तो कुछ लोग कहने लगे कि इस स्‍वतंत्रता से हमें क्‍या मिला, इस जनतंत्र से हमें क्‍या मिला, इस लोकतंत्र से हमें क्‍या मिला।  जब इतनी बर्बादी हुई हम अंग्रेजी सरकार से किस तरह से बेहतर हैं?  तो उस जमाने में लोगों के सामने जो पेरशानी आई थी, जो उनका सामना नहीं कर सकते थे उन्‍हें अंग्रेज सरकार अच्‍छी लगती थी, क्‍योंकि अंग्रेजी सरकार में उनको शांति थी और हमारी जब सरकार आई तो अशांति हो गई।  कुछ लोग स्‍वतंत्रता की कोई भी कीमत देने के लिए तैयार नहीं हैं।  वे चाहते हैं कि नि:शुल्‍क ही मिले।  हम जानते हैं कि और देशों में स्‍वतंत्रता की प्राप्ति के लिए बहुत संख्‍या में मारकाट हुई।  महात्‍मा गांधी के पुण्‍य से, उनके आशीर्वाद, उनकी पहल से और उनके बनाए हुए वातावरण से हमें बहुत थोड़ी कीमत ही स्‍वतंत्रता के लिए देनी पड़ी।  फिर भी कुछ लोग इस कीमत को देने के लिए तैयार नहीं थे।  इसलिए यह कहना कि अगर एक बार हमें जनतंत्र मिल गया तो हमेशा के लिए पक्‍का रहेगा यह ठीक नहीं है।  हमारे समाज में ऐसे कमजोर लोग बहुत हैं जो समझते हैं कि यह पद्धति ही खराब है जिससे हमें परेशानी हुई है।  कोई दुकानदार है उसको क्‍या फर्क पड़ता है कि कौन-सी पार्टी आए और कौन-सी पार्टी जाए, जनतंत्र आए या जाए अंतर पड़ता होगा अप्रत्‍यक्ष रूप में, लेकिन प्रत्‍यक्ष में उनको अंतर नहीं पड़ता है इसलिए हमने आज  यह काम किया है पंचायती राज के माध्‍यम से हमारे संविधान निर्माताओं ने जो काम करवा कर दिखाना चाहा वह यह था कि लाखों हमारे लोग हमारे देश में इस नई प्रणाली में इस नई व्‍यवस्‍था में जुट जाएँ।
    पंचायती राज पहली बार 1959 में जब पंडित जी लेकर आए तो हमारी पंचायती समितियाँ आदि सब बनीं।  लेकिन और रूप में बनीं तो उन पंचायती समितियों में कभी चुनाव हुए, कभी नहीं हुए और मुख्‍य मंत्री को ऐसा लगने लगा या जिस पार्टी का शासन उस राज्‍य में था, उस पार्टी को ऐसा लगा, अगली बार चुनाव करेंगे तो शायद हमारा बहुमत नहीं आएगा तो उन्‍होंने पंचायतों के चुनाव नहीं किए।