Thursday, 9 January 2020

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 10th January, 2020 at YouTube


     अध्यक्ष महोदय, हमने भाषा अधिनियम की किसी भी बुनियादी बात में परिवर्तन नहीं किया।  हमने ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिससे गैर-हिंदी भाषी लोगों को दिये गए आश्वासन समाप्त होते अथवा उनमें कमी होती।  हमने आखिर किसका बोझ बढ़ाया?  हमने गैर हिंदी भाषी लोगों का नहीं, बल्कि केंद्रीय सचिवालय के अधिकारियों का इस दृष्टि से बोझ बढ़ाया कि अब उन्हें केवल हिंदी से अंग्रेजी में ही नहीं बल्कि अंग्रेजी से हिंदी में भी अनुवाद उपलब्ध कराना है।  हमने केवल यही कार्रवाई की।   इस सदन में गृहमंत्री ने यह स्पष्ट कर दिया था कि यह भार हमारे ऊपर होगा, उन लोगों के ऊपर नहीं जो हिंदी का प्रयोग नहीं करना चाहते।  यह स्वाभाविक है कि जब कोई नया कदम उठाया जाता है तो इससे कुछ भार बढ़ता है।  इससे उन लोगों के ऊपर भार पड़ता है, जिन्हें नई भाषा सीखनी होती है।  लेकिन अहिंदी राज्यों के माननीय सदस्य यह नहीं समझते कि हिंदी सीखने का भार हिंदी राज्यों में रहने वाले लोगों पर भी कुछ ही कम है।  मैं स्वयं अपना उदाहरण देकर यह कह सकती हूँ कि यहाँ जो हिंदी बोली जाती है, वह मेरे लिए एकदम नई भाषा है और मुझे इसे नए सिरे से सीखना पड़ा।
      नई कार्रवाई का किसी न किसी पर भार पड़ता ही है।  जैसा कि गृहमंत्री ने कहा है, यह भार गैर-हिंदी भाषी लोगों पर कुछ अधिक होगा।  लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यह कठिनाई चाहे कुछ भी है, हम इस पर विचार करेंगे और इसे घटाने की कोशिश करेंगे।  हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम बैठकर इस बात पर विचार करें कि विभिन्न राज्यों और प्रशासकों की कठिनाइयाँ क्या हैं।  उन्होंने यह बात भी कही थी।  मैं समझती हूँ कि जब तक वातावरण शांत नहीं होता, इस संबंध में जितना काम हो जाए उतना अच्छा, क्योंकि तब हम लोग एक साथ बैठकर इस पर विचार कर ऐसा तरीका निकालने की बेहतर स्थिति में होंगे जो देश की एकता को बढ़ाएगा और हम लोगों के बीच परस्पर संपर्क को ही अधिक नहीं बढ़ाएगा, जिन्हें उच्च शिक्षा का सौभाग्य प्राप्त हुआ है बल्कि उन लोगों का भी संपर्क बढ़एगा जिन्हें यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ।  अब समय आ गया है कि हम उन लोगों को भी यह समानता और अवसर दें और भाषा के कारण जो वर्ग भेद बढ़ा है उसे कम करें।

Monday, 6 January 2020

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 7th January, 2020 at YouTube


     अध्यक्ष महोदय, पिछले 50 वर्षों में हमने योजनाबद्ध विकास का सहारा लिया है और मैं समझती हूँ कि  हमारा यह निर्णय सही सिद्ध हुआ है।  इस क्षेत्र में जो काम हुआ है उसके बिना हमारा देश उन बड़ी चुनौतियों पर विजय नहीं पा सकता था, जो पिछले कुछ वर्षों में विदेशी आक्रमणों और अत्यधिक कठिन तथा अकल्पित आर्थिक समस्याओं के रूप में हमारे सामने आईं।  यह वस्तुतः आश्चर्यजनक है कि विपक्ष के मेरे मित्र प्रोफेसर साहब आज भी योजनाओं को बंद कर देने का राग अलापते हैं, जबकि जिन उद्योगपतियों की ओर से उनकी पार्टी बोलती है वे सरकार पर और अधिक पूँजी लगाने के लिए जोर डालते हैं।  इस देश में उस समय तक योजनाएँ बंद नहीं हो सकतीं, जब तक इस देश में इस पार्टी की सरकार है, जब तक इस देश में सामाजिक न्याय माँगनेवाले करोड़ों भूखे-नंगे मौजूद हैं।
     एक अन्य समस्या, जो हमें दुखी करती है, अनुसूचित जातियों तथा आदिम जातियों और भूमिहीन मजदूरों के लिए और अधिक न कर पाने की हमारी अक्षमता है, लेकिन मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इन कार्यक्रमों में जो कमियाँ हैं, उनके प्रति मैं पूरी तरह सजग हूँ और यह समझती हूँ कि इस संबंध में और बहुत कुछ किया जाना चाहिए।  हम इन कमियों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।  इसी प्रकार मुझे देश के सब अल्पसंख्यकों का ध्यान है।  इस संबंध में भी हम अपने दायित्व के प्रति पूरी तरह सजग हैं।  हम इस समस्या पर निरंतर विचार कर रहे हैं और अनेक संगठनों के लोगों से हमारा संपर्क है।  इन संगठनों में राजनीतिक और अराजनीतिक दोनों प्रकार के संगठन हैं।  हम इनके सहयोग से समस्या का समाधान ढूँढ रहे हैं तथा समय-समय पर सांप्रदायिक तनाव की जो क्रूर घटनाएं होती हैं उनको रोकने के उपाय भी खोज रहे हैं।  मैं वस्तुतः इस अवसर पर भाषा के बारे में नहीं बोलना चाहती थी, लेकिन अनेक माननीय सदस्यों ने इसका उल्लेख किया है।  बुनियादी प्रश्न यह था कि अहिंदी भाषी लोगों को हमारे बड़ों और प्रधानमंत्री ने जो आश्वासन दिए थे वे पूरे हों। इसी कारण से यह भाषा विधेयक संसद में पेश करना पड़ा।  यह सच है कि जब यह विधेयक सदन में पेश हुआ तो कुछ लोगों ने यह अनुभव किया कि इससे उनको कठिनाई होगी।  आखिर हमने किया क्या था?
      

Saturday, 4 January 2020

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 4th January, 2020 at YouTube


     अध्यक्ष महोदय, मैं चाहता हूँ कि हमारे देश के नौजवान जितना आगे बढ़ सकते हैं, बढ़ें।  हम उनको छोटा नहीं समझते और न हम इस बात का अहंकार करते हैं कि हम ही कुर्बानी कर सकते हैं, देश के लिए, वे लोग भी कर सकते हैं।  परमात्मा की कृपा से कभी उन्हें गुलामी के खिलाफ जंग लड़ने के लिए कुर्बानी नहीं करनी पड़ेगी, पर यह जरूर है कि स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए कुर्बानी करनी पड़ सकती है।  अपनी इस स्‍वतंत्रता और आजादी को बरकरार रखना निहायत जरूरी है, हम सब देशवासियों के लिए जिन बातों में जिन रचनात्मक कामों में  हमको लगना चाहिए, लगे रहना चाहिए और मैं आपको एक सलाह दूँगा कि आप अपनी संतान में कम-से-कम एक सदस्य को राजनीति के मैदान में फेंक दें, ताकि यह राजनीतिक मैदान पवित्र रहे, देशभक्ति वाला रहे।  स्वार्थी ताकतें इस राजनीति के मैदान में न रहें।  मुझे इस बात की पूरी आशा है और मैं उम्मीद रखता हूँ कि सरकार और समाज आपके सम्मान को बढ़ाते रहेंगे।
    मैं इन शब्दों के साथ आपको प्रणाम करता हुआ यह संदेश देना चाहता हूँ कि 15 अगस्त आ रहा है।  मैंने सब राज्यपालों को कहा है कि वे अपने-अपने राज्य के जितने स्वतंत्रता सेनानी जिंदा हैं, उनको दावत देकर 15 अगस्त को राजभवन में बुलाएँ और उन्हें आदर-सम्मान का स्थान दें।  इस एक दिन के सम्मान से कोई बहुत बड़ी बात नहीं होगी, लेकिन समाज व आने वाली पीढ़ियों को पता चलेगा कि यह वे लोग हैं, जिन्होंने हमें स्वतंत्रता लेकर दी थी।  जो हमको अपनी किस्मत का मालिक खुद बना गए।  इसी तरह राष्ट्रपति भवन में भी दिल्ली में रहने वाले सभी स्वतंत्रता सेनानियों को दावत दी जाएगी, ताकि वे हमें राष्ट्रपति भवन में होने वाले इस स्वागत समारोह में दर्शन दे सकें, जिसमें हमारी प्रधानमंत्री, मंत्रिगण, सब वी.आई.पी. और दुनिया भर के डिप्लोमैट भी शामिल होते हैं।  मुझे आशा है कि जिन लोगों ने इस काम को अपने हाथ में लिया है, आगे भी इस काम को कुशलता से निभाते चले जाएँगे।  जिन स्‍वतंत्रता सेनानियों को परमात्मा ने लंबी उम्र दी है ओैर वे अभी हमारे बीच हैं, मैं उनको बूढ़ा नहीं समझता।  मैं समझता हूँ कि उनका दिल जवान है, उनमें हिम्मत है, दिलेरी है, इसलिए वे आज भी सम्माननीय हैं।
   

Wednesday, 1 January 2020

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 2nd January, 2020 at YouTube


अध्यक्ष महोदय, मुझे ऐसी संस्था में आकर बहुत प्रसन्नता होती है।  भारत सरकार ने 1972 के बाद स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा देश के प्रति की गई सेवाओं को याद करते हुए, उन्हें जो सम्मान दिए, उनमें एक स्थायी सनद भी दी गई, जिसको ताम्रपत्र कहते हैं, उसके बाद सरकार ने फिर जब कुछ और करना चाहा, तो उन्हें पेन्शन भी दी जाने लगी।  यह पेन्शन एक सहायता नहीं, बल्कि एक सम्मान है, जिसे भारत सरकार भी देती है और अब कुछ प्रांतीय सरकारें भी इसमें  अपना योगदान दे रही हैं।  यह सम्मान, पेन्शन और ताम्रपत्र सब एक तरफ हैं, दूसरी तरफ अब हमें यह देखना है कि ये हमारे पुराने जमाने के लोग जिन्होंने हिंदुस्तान की स्‍वतंत्रता के लिए सब कुछ किया, जिनकी वजह से आज हिंदुस्‍तान दुनिया की सर्वोच्च श्रेणी में पहुँचकर अपने सम्मान को बढ़ा रहा है और अपनी किस्मत का मालिक खुद बना हुआ है उनके लिए हम और क्या करें।  इसके साथ-साथ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इंसान को राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ, आर्थिक स्वतंत्रता भी मिलनी बहुत जरूरी है और जो अभी तक हम उस आर्थिक स्वतंत्रता को पूर्ण नहीं कर पाए, उसमें आप जैसे स्मरणीय लोगों का योगदान अब भी हो सकता है।
     मैं जानता हूँ कि बहुत पुराने बुजुर्ग, जिन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष के शुरू में ही बहुत बड़ा हिस्सा लिया था, वे इस संसार से चले गए हैं और कुछ वे लोग जिन्होंने उस वक्त बलिदान दिया, उनकी आज याद बाकी रह गई है और आपको ये भी मालूम है कि ताकत हमेशा अपना असर, अपना दबाव समाज पर रखती रही है और रखती रहेगी।  इसलिए यह जरूरी है कि हम स्वतंत्रता के संग्राम में हिस्सा लेने वाले लोग बिल्कुल खामोश होकर न बैठ जाएँ।  हमें जहाँ राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत करना है, वहाँ हमें इस बात के लिए भी उपाय करना है कि यह भावना, यह देशभक्ति यह हिंदुस्तान का प्यार, इसकी एकता, यहाँ के रहने वाले लोगों के आपसी भाईचारे को कायम रखने के लिए हम सरकार और समाज को पूरा-पूरा ध्यान व सहयोग देकर मजबूत करें।  मुझे आशा है कि इस मामले में हमारा समाज और हमारी सरकार ढील नहीं बरतेगी और वह आदर-सम्मान स्वतंत्रता सेनानियों को ही नहीं, बल्कि उनकी संतान को भी मिलता रहेगा, क्योंकि उनके खून के अंदर देशभक्ति है।


Monday, 30 December 2019

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 31 December, 2019 at YouTube


     स्पीकर महोदय, मैं सोचता हूँ कि अगर आप डेढ़ वर्ष पीछे जा सकते और फिर यह देख सकते कि इन डेढ वर्षों में क्या हुआ है, तो आपको लगेगा कि भारत बहुत अर्थों में अपनी सब तरह की मुश्किलों और तकलीफों के बावजूद, जिनमें से वह गुजरा है, काफी आगे बढ़ा है।  हमारी सरकार और विशेष कर मुझे बहुत बोझ उठाना पड़ रहा है; हमारे सामने आज भी बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ हैं।  फिर भी, मैं पूरी ईमानदारी से कहता हूँ कि मेरे अंदर न असफलता का भाव है और मैं दूर-भविष्य तो नहीं निकट-भविष्य की ओर पूरे विश्वास के साथ देखता हूँ और अपने अंदर छुपा हुआ एक ऐसा अनुभव पाता हूँ कि मुझे इस भारत के इतिहास के महत्वपूर्ण चरण में हिस्सा लेने का अवसर मिला।  क्योंकि आपने मेरे प्रस्तावों का जिक्र किया है, इसलिए मैं एक चीज कहना चाहूँगा कि बजट में बहुत-सी चीजें हुआ करती हैं, जिनसे कुछ सदस्यों को शायद खुशी न होती हो।  शायद हम इस बात में या उस बात में कुछ और बेहतर काम कर सकते थे लेकिन मैं समझता हूँ कि स्वयं बजट हमारी और हमारे राष्ट्र की ताकत की निशानी है।  मेरे ख्‍याल से जिस ध्यान और दूरदर्शिता के साथ हमारे वित्त मंत्री ने यह बजट तैयार किया है, उससे आने वाले महीनों और वर्षों में हमें बहुत लाभ होगा।
     अगर मैं साफ कहूँ कि हमने बहुत फूँक-फूँक कर कदम रखे हैं क्योंकि हममें आपने जो बहुत बड़ा भरोसा रखा है, उसके बारे में हम जोखिम नहीं उठाना चाहते।  बहुत सी चीजें हैं जो हमने चाहते हुए भी नहीं की, क्योंकि हम भारत के भविष्य और भारत के वर्तमान को दाँव पर नहीं लगा सकते थे।  ऐसी चीजों में भी जो हमारे ही सिद्धांतों और विचारों के अनुसार है अगर, कोई जोखिम या खतरा दिखाई दिया तो, हम उसमें भी आगे नहीं बढ़े तथा हम सतर्कता के साथ आगे बढ़े हैं।  हो सकता है कि अगर हमने ज्यादा साहस नहीं दिखाया होता, तो कुछ काम जल्दी हो जाता, लेकिन में व्यक्तिगत तौर से इस नाजुक वक्त में बहुत होशियारी से चलने की नीति पर चलने से पूरी तरह सहमत हूँ।  जहाँ-जहाँ छोटी-मोटी बात के अलावा, मैं अपने साथी वित्तमंत्री की प्रशंसा करना चाहता हूँ कि किस साहस, दृष्टि और ऊँची बुद्धिमत्ता के साथ उन्होंने समस्या को सुलझाया है।  यह सराहनीय प्रयास है।

Thursday, 26 December 2019

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 27 December, 2019 at YouTube


   स्पीकर महोदय, यह सदन निस्संदेह हमारी विदेश नीति और विदेशी मामलों के बहुत-से पहलुओं में दिलचस्पी रखता है और इस बारे में भी कि भारत पर इसका क्या असर पड़ता है।  संभवतः आज जो बहस होने वाली है उसमें इन बहुत-सी बातों के बारे मैं ध्यान खींचा जाएगा।  लेकिन महोदय मैं आपकी अनुमति और इस सदन की सहमति से विदेशी मामलों और विदेश नीति और उनका भारत पर क्या-क्या असर पड़ता है और हम इनको किस दृष्टि से देखते हैं, इन चीजों के सामान्य पहलुओं के बारे में कुछ कहना चाहूँगा और मुख्य समस्या की छोटी-छोटी बातों में नहीं जाऊँगा।  इससे भी पहले मैं केवल विदेशी मामलों में ही नहीं बल्कि स्वयं भारत के बारे में कुछ आम बातें कहूँगा।  पिछले कुछ दिनों में बजट प्रस्तावों के सिलसिले में बहुत कुछ नुक्ताचीनी की गई और कम या ज्यादा जोर के साथ सरकार की असफलताएँ बताई गई हैं। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं हर तरह की आलोचना का स्वागत करता हूँ और मैं इस बात पर विश्वास करता हूँ कि अगर यह सदन सिर्फ एक गतिहीन सदन, दब्बू सदन या ऐसा सदन जो हर सरकारी चीज की हाँ-में-हाँ मिलाने वाला सदन हो जाए, तो यह मेरे विचार से दुर्भाग्यपूर्ण होगा।  हमेशा चौकन्ना रहना ही स्वतंत्रता की कीमत है और इस सदन के हर सदस्य को हर समय जागृत व चौकन्ना रहना है।  हाँ, सरकार को भी चौकस रहना चाहिए।  लेकिन जो लोग सत्ताधारी होते हैं, उनमें लापरवाह प्रवृत्ति रहती है, इसलिए मैं अपनी तरफ से इस सदन के माननीय सदस्यों की चौकसी का स्वागत करता हूँ, जिन्होंने सरकार की हर गलती, असफलता या कमी की तरफ हमारा ध्यान खींचा है।
   मैं आशा करता हूँ कि यहाँ की आलोचना अच्छी भावना से दोस्ती के तरीकों से की गई है और वह सरकार की ईमानदारी को चुनौती देती है।  हाँ, अगर सरकार की अच्छी भावना को भी चुनौती देने की इच्छा हो तो भी मैं उसमें विरोध नहीं करूँगा, बशर्ते, यह स्पष्ट हो कि यही चीज विचाराधीन है।  इस आलोचना को सुनते हुए या उसके बारे में पढ़ते हुए मुझे ऐसा लगा कि शायद हम लकड़ी की तुलना में पेड़ों की तरफ ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।  पिछले 18 महीनों में जो-कुछ हुआ है उस पर और भारत की सारी तस्वीर पर गौर नहीं कर रहे।  जहाँ तक आप निष्पक्ष रूप से देख सकते हैं अवश्य देखिए।


Wednesday, 2 October 2019

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 03 October, 2019 at YouTube


अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की बढ़ती खीझ का असर आज सार्क यानी दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में भी देखने को मिला। वहां जिस समय भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर अपना शुरुआती बयान दे रहे थे, तब पाकिस्तान के विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने इसका बहिष्कार किया। वह जयशंकर का भाषण खत्म होने के बाद ही बैठक में पहुंचे और यह भी कहा कि जब तक भारत कश्मीर पर अपने फैसले को वापस नहीं लेता, वह किसी वैश्विक मंच पर भारत के साथ नहीं रहेंगे। जाहिर है, भारत को वैसा ही जवाब देना पड़ा। जब पाकिस्तानी विदेश मंत्री का भाषण हुआ, तो भारतीय विदेश मंत्री वहां मौजूद नहीं थे। वैसे एस जयशंकर एक दिन पहले ही यह बयान दे चुके थे कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद का इस्तेमाल अपनी विदेश नीति के औजार की तरह करता रहेगा, उसके साथ किसी भी तरह की बातचीत संभव नहीं है। यह पहली बार नहीं है, जब पाकिस्तान के रवैये के चलते सार्क अपना अर्थ खोने लग गया हो। 2016 का सार्क सम्मेलन इस्लामाबाद में होना था, लेकिन उसके ठीक पहले उरी में भारतीय सेना के शिविर पर आतंकवादी हमला हो गया। इसके बाद भारत ने घोषणा कर दी कि वह इस्लामाबाद के सार्क सम्मेलन में भाग लेने नहीं जाएगा। उसके बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान भी भारत के समर्थन में आ गए, उन्होंने भी इस्लामाबाद सम्मेलन में शामिल न होने की घोषणा की, जिसके बाद वह सम्मेलन रद्द करना पड़ा था। सार्क का अगला सम्मेलन कोलंबो में इसी साल होना है, लेकिन सार्क जो उम्मीद बंधाता था, उसकी कमर पाकिस्तान बहुत पहले ही तोड़ चुका है। रही-सही कसर इस बार निकल गई, जब संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन से पहले सार्क देशों ने अपनी बैठक का फैसला किया। 
पाकिस्तान की खीझ लगातार इसलिए भी बढ़ती जा रही है कि कश्मीर मामले पर पूरी दुनिया दो चीजों को अच्छी तरह समझ गई है। एक, कश्मीर में भारत ने जो किया, वह उसका आंतरिक मामला है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाना और इस क्षेत्र का दर्जा बदलना ऐसा काम नहीं है, जिसमें किसी अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदे का कोई उल्लंघन हुआ हो। दूसरी, पूरी दुनिया शिमला समझौते की उस भावना को स्वीकार करती है कि जिसे कश्मीर मसला कहा जा रहा है, वह भारत और पाकिस्तान का आपसी विवाद है, जिसे दोनों को खुद ही बातचीत से सुलझाना होगा। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान पिछले कई हफ्तों से पूरी दुनिया की ताकतों से मध्यस्थता की मांग करते घूम रहे हैं, लेकिन कोई भी इसे स्वीकार नहीं कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस मसले पर यही कहा है कि कोई भी मध्यस्थता तभी हो सकती है, जब दोनों देश इस पर राजी हों। इस मसले पर चीन भी पाकिस्तान की बहुत ज्यादा मदद नहीं कर पाया।
अब पाकिस्तान को कई सच स्वीकार करने होंगे। पहला यह कि कश्मीर में भारत ने जो किया, वह उसका आंतरिक मामला है, उसे इस पर कुछ बोलने का अधिकार नहीं है। दूसरा, आतंक के इस्तेमाल की नीति ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा है और इस नीति को खत्म करने का कोई विकल्प नहीं है। लेकिन लगता नहीं कि पाकिस्तान इतनी जल्दी इन सच को स्वीकार कर पाएगा।


Thursday, 26 September 2019

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 27 September, 2019 at YouTube



अमेरिका में विगत चार दिनों के तेज घटनाक्रम में न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताकत बढ़ी है, बल्कि भारत को भी कूटनीतिक रूप से पर्याप्त बढ़त मिली है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत को हुआ लाभ इसलिए भी बहुत स्पष्ट होकर उभरा है, क्योंकि एक तरह से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने स्वीकार कर लिया है कि कश्मीर के मसले पर उनकी कोशिशें नाकाम हुई हैं। विरोध व शंकाओं की कुछ चर्चाओं को छोड़ दीजिए, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भरोसा जताते हुए यहां तक कह दिया है कि नरेंद्र मोदी कश्मीर और आतंकवाद को संभाल सकते हैं। भारतीय प्रधानमंत्री पर भरोसा जताकर भारत को अमेरिका ने जो अवसर दिया है, उसका भारत सरकार को भरपूर उपयोग करना चाहिए, ताकि कश्मीर में सामान्य जीवन बहाल हो जाए। यह अवसर भारत की कूटनीति को थोड़ी सशक्त देख अभिभूत होने का नहीं है। आतंकवाद पर अमेरिका में इमरान को कोई पाठ पढ़ाया गया हो, ऐसा दिखा नहीं, क्योंकि न सिर्फ ईरान, बल्कि अफगानिस्तान में भी अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत है। अमेरिका ने अभी केवल इतना संदेश दिया है कि वह भारत पर अतिरिक्त दबाव नहीं बनाएगा। 
कुल मिलाकर, अमेरिकी घटनाक्रम से थोड़ी उम्मीद बढ़ी है, क्योंकि इससे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को भी सबक मिले हैं और भारतीय प्रधानमंत्री को भी। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को यह सबक मिला है कि बाजार और अर्थव्यवस्था की मजबूती के कारण कोई भी भारत के खिलाफ जाना नहीं चाहता। भारत के लिए यह खुशी की बात है, विगत दशकों से यह बात होती आई थी कि भारत अपनी ताकत और महत्व को बढ़ाए, तो दुनिया उसकी बात सुनेगी। आज हम जिस मुकाम पर पहुंच गए हैं, वहां से हमें पीछे नहीं देखना है। भारत को जहां उसके लोकतंत्र, सद्भावी समाज, उदारता, शांति, संयम का लाभ मिलने लगा है, वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान को इन विशेषताओं के अभाव का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। 
ऐसे में, भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने बिल्कुल सामयिक टिप्पणी की है कि भारत को पाकिस्तान से बात करने में कोई परहेज नहीं, लेकिन भारत टेररिस्तानसे बात नहीं करेगा। पाकिस्तान अगर चाहता है कि भविष्य में वैश्विक मंच पर उसकी बात का वजन बढ़े, उसके प्रधानमंत्री का महत्व बढ़े, तो उसे टेररिस्तानहोने के बदनुमा दाग से जल्दी छुटकारा पाना होगा। अभी पाकिस्तान का लिहाज ट्रंप और कुछ देश शायद इसलिए भी कर रहे होंगे, क्योंकि वह परमाणु शक्ति है, उसे एक सीमा तक ही निराश किया जा सकता है। बहरहाल, जब इमरान खान भारत को आर्थिक शक्ति के रूप में देख पा रहे हैं, तो उन्हें भी पाकिस्तान की आर्थिक तरक्की पर फोकस करना चाहिए और इसके लिए सबसे जरूरी है अमन-चैन। भारत पहले ही बोलता रहा है कि दूसरों का अमन-चैन तबाह करके कोई स्वयं कब तक अमन-चैन से रह सकता है? आज पाकिस्तान जहां है, वहां उसे भारत ने नहीं खड़ा किया, वह वहां स्वयं जा फंसा है। पाकिस्तान को अगर वाकई अपनी इज्जत और कश्मीरियों की फिक्र है, तो उसे कश्मीर में अलगाववादियों और आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करके सबसे पहले अपने देश में अमन और तरक्की का नया युग शुरू करना चाहिए।


Monday, 5 August 2019

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 6 August, 2019 at YouTube


   महोदय, राष्ट्रभाषा का ही क्रमिक रूप है राजभाषा।  महात्मा गाँधी को ही यह श्रेय जाता है कि राष्ट्र की कोई एक संपर्क भाषा हो - इस पर उन्होंने बल दिया था।  हालाँकि गाँधीजी के राष्ट्रभाषा संबंधी आग्रह के पीछे मुख्य रूप से राष्ट्रीयता तथा स्वतंत्रता आंदोलन की समग्रता थी।आज हिंदी, संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत की राजभाषा है, लेकिन व्यावहारिक रूप से उसकी जगह अंग्रेजी ही कार्यरत है।  तो मैं बराबर गाँधीजी को याद करता हूँ।  बापू ने आज 70-80 वर्षों पूर्व हिंदी के संबंध में जो बातें कही थीं, वे आज भी सामयिक और सार्थक हैं।  आज, जब हम हिंदी दिवस समारोह मना रहे हैं तो एक बार पुनः गाँधीजी को ही सामने रखकर गंभीरता से विचार करें कि राष्ट्रभाषा के संदर्भ में राष्ट्रपिता की चिंता को भी हमने महत्व नहीं दिया।  बजाय इसके कि यहाँ मैं अपनी ओर से कुछ कहूँ, गाँधी के कहे को ही आपके सामने रखाना चाहता हूँ।  काश ! आज भी राष्ट्र इसे ग्रहण कर ले तो जहाँ एक ओर उसकी अस्मिता में चार चाँद लग जाएँ, वहीं राष्ट्रपिता की आत्मा को भी शांति मिल जाए।  इसीलिए गाँधी जी का लिखा राष्ट्रभाषा संबंधी यह लेख यथावत मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
   हमारी भाषा हमारा ही प्रतिबिंब होती है, और यदि आप मुझसे यह कहते हैं कि हमारी भाषाएँ अशक्त हैं, कि उनके द्वारा सर्वोत्तम विचार व्यक्त नहीं किए जा सकते तो मैं यह कहूँगा कि हमारा अस्तित्व जितनी जल्‍दी समाप्त हो जाए उतना ही हमारे लिए अच्छा होगा।  क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो कल्पना करता हो कि अंग्रेजी कभी भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है?  राष्ट्र पर यह मुसीबत क्यों डाली जाए?  मुझे पूना के कुछ प्राध्यापकों के साथ घनिष्ठ बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।  उन्होंने मुझे यह विश्वास दिलाया कि हर एक भारतीय युवक चूँकि वह अंग्रेजी भाषा के माध्यम से शिक्षा पाता है, इसलिए अपने जीवन के कम से कम छह बहुमूल्य वर्ष व्यर्थ गँवा देता है।  इस संख्या में गुणा कीजिए और फिर स्वयं यह पता लगाइए कि राष्ट्र ने कितने हजार वर्ष गँवा दिये हैं।  हमारे ऊपर आरोप यह लगाया जाता है कि हमारे अंदर आगे बढ़ने की शक्ति नहीं है।  हमारे अंदर वह शक्ति हो ही नहीं सकती है।


Sunday, 7 July 2019

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 8 July, 2019 at YouTube


सभापति महोदय, एक विकलांग बच्‍चा क्षमताओं, योग्‍यताओं तथा अन्‍य बातों में सामान्‍य बच्‍चों से कुछ भिन्‍न होता है।  उसे अन्‍य लोगों से सहयोग की आवश्‍यकता होती है।  इस सहयोग की अपेक्षा सर्वप्रथम वह अपने माता-पिता, आस-पास के वातावरण व समाज से करता है।  इसलिए माता-पिता की जिम्‍मेदारी इस बच्‍चे के प्रति कुछ ज्‍यादा हाती है।  वह बच्‍चे के प्रति अपनी हीन भावना व अपराध बोध को त्‍याग कर, उससे एक सामान्‍य बालक की भाँति अपेक्षाएँ न रखकर संयम के साथ सहज व्‍यवहार करें, क्‍योंकि यही सहज व्‍यवहार बालक के विकास व आत्‍मसम्‍मान की वृद्धि में सहायक सिद्ध होता है।  
यदि परिवार में विकलांग बच्‍चा जन्‍म लेता है या किसी बीमारी या दुर्घटना के कारण से विकलांग हो जाता है, तो परिवार में एक मानसिक तनाव की स्थिति उत्‍पन्‍न हो जाती है।  अभिभावकों का उसके पालन-पेाषण व भविष्‍य को लेकर चिंतित होना स्‍वाभाविक है। परंतु इस चिंता और मानसिक तनाव को किसी भी परिस्थिति में उस विकलांग बच्‍चे के समक्ष प्रकट न करें, यथाशीघ्र चिकित्‍सक, परामर्शदाता, या कोई ऐसी संस्‍था जो उस विकलांगता से संबंधित क्षेत्र में कार्यरत हो, से मिलकर उसके सहयोग से बच्‍चे के विकास व भविष्‍य निर्माण में अपना योगदान दें, साथ ही साथ परिवार के अन्‍य सदस्‍यों को भी बच्‍चे के प्रति सहज व्‍यवहार के लिए प्रेरित करें।  इससे विकलांग बच्‍चे में हीन भावना नहीं आएगी और थोड़ी-बहुत आ भी जाती है तो बालक को प्‍यार व सहयोग से दैनिक कार्य सीखने के लिए प्रोत्‍साहित कर उसे धीरे-धीरे स्‍वावलंबी बनाएँ।  इससे उसके मन में उत्‍पन्‍न हीन भावना स्‍वत: समाप्‍त हो जाएगी।  उसमें अच्‍छी आदतों के विकास के लिए जैसे अपने सामान को यथास्‍थान रखना, खेल के स्‍थान को साफ-सुथरा रखना, नहाना, दाँत साफ करना आदि कार्य जो सामान्‍य बच्‍चे करते हैं, सिखाएँ और उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित करें, जिससे वह कार्य करने में रुचि ले। 
विकलांग बालकों को सिखाते समय उपयुक्‍त सामग्री अवश्‍य उपलब्‍ध हो, इससे बालक इन कामों को शीघ्र सीखता है।  जैसे अगर हम उसे किसी जानवर के विषय में बता रहे हैं तो हमें उस जानवर को या उसका चित्र बच्‍चे को दिखाना चाहिए।  माता-पिता अपना खाली समय उसके साथ खेलने, बातचीत करने व नए-नए कार्य सिखाने में व्‍यतीत करें।

Thursday, 4 July 2019

Shorthand Dictation (Hindi) Matter Published on 5 July, 2019 at YouTube


    महोदय, मुझे खेल-प्रेमी नगर कोलकाता में नेताजी सुभाष राष्‍ट्रीय खेल संस्‍थान के पूर्वी केंद्र के उद्घाटन समारोह के अवसर पर आप लोगों के बीच आकर बड़ी प्रसन्‍नता हुई है।  यह केंद्र देश में और विशेष रूप से देश के पूर्वी भाग में खेलकूद को बढ़ावा देने का कार्य करेगा।  कितनी अच्‍छी बात है कि हमारे सम्‍मानित प्‍यारे नेता स्‍वर्गीय नेताजी सुभाष के नाम पर इस संस्‍थान की स्‍थापना की गई है, और उनके जन्‍म दिन 23 जनवरी को ही इस केंद्र का उद्घाटन किया जा रहा है।  नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपना सारा जीवन देश की स्‍वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया था।  त्‍याग और बलिदान की उनकी भावना से हम सबको और विशेष रूप से नौजवान पीढ़ी को प्रेरणा मिलती है।  नेताजी ने एक ऐसे मजबूत, संगठित और स्‍वतंत्र भारत का स्‍वप्‍न देखा था, जिसके लोग शारीरिक और दिमागी तौर पर तंदुरुस्‍त हों।  मुझे शक नहीं कि नेताजी सुभाष खेल संस्‍थान इस स्‍वप्‍न को पूरा करने का कार्य करेगा। 
    नेताजी सुभाष राष्‍ट्रीय खेल संस्‍थान की स्‍थापना 1961 में पटियाला में हुई थी, जिसका पिछले 32 वर्षों में काफी विकास हुआ है।  संस्‍थान ने अब तक पंद्रह हजार से अधिक कोच तैयार किए हैं और देश के राष्‍ट्रीय खेल संघों के खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने में भी सहायता की है।  खेलों के मामले में देश के दक्षिणी प्रदेशों की विशेष आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए कुछ वर्ष पूर्व इसी दिन बंगलौर में इसके दक्षिणी केंद्र का उद्घाटन किया गया था।  मुझे पूरी आशा है कि कोलकाता में पूर्वी केंद्र की स्‍थापना से खेलों के क्षेत्र में संस्‍थान राष्‍ट्र के लिए उपयोगी सेवा कर सकेगा।  कुछ वर्ष पूर्व में, हमने नई दिल्‍ली में नौवें एशियाई खेलों का आयोजन किया था।  ये खेल काफी कामयाब रहे।  सारा राष्‍ट्र उन लोगों की सराहना करता है, जिन्‍होंने इन खेलों के आयोजन के लिए काम किया था।  नेताजी सुभाष राष्‍ट्रीय संस्‍थान ने भी अंतर्राष्‍ट्रीय महत्‍व के इस काम में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
    इन खेलों में हमारी टीमों और खेल प्रतियोगियों ने पहले से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया।  हमारे खिलाड़ियों ने इन खेलों में 57 मैडल जीते जब कि 1978 में बैंकाक में हुए पिछले एशियाई खेलों में उन्‍हें 28 मैडल ही मिले थे।  इस के लिए खेल-विभाग, नेताजी सुभाष राष्‍ट्रीय खेल संस्‍थान, राष्‍ट्रीय खेल संघ तथा भारतीय ओलम्पिक संघ बधाई के पात्र हैं।